तुम

तुम
वो बिनामतलब के इल्जाम
वो बिनवजह से रूठना
वो बेहिसाब इन्तजार
वो टूटती उम्मीद
वो रुवासा सा मेरा मन
तुम तुम ही हो
या कूदकर जान दे दूँ मै अपनी वी मंजिल से.

4 comments:

सचिन मिश्रा said...

Bahut accha likha hai.

Arpit Gupta said...

Achha hai per ismina creativity na hoker destruction ki bhawna hai usko zara dhyan de....

मनुज मेहता said...

तुम
वो बिनामतलब के इल्जाम
वो बिनवजह से रूठना
वो बेहिसाब इन्तजार
वो टूटती उम्मीद
वो रुवासा सा मेरा मन
तुम तुम ही हो
या कूदकर जान दे दूँ मै अपनी ५ वी मंजिल से.
achi rachna hai, keep writing and thanks for sharing.

PD said...

अरे ऐसा मत लिखिए महाराज..
हमारा नाम और आपका नाम भी बराबर है और हम भी पांचवी मंजिल पर रहते हैं.. कहीं गलती से मेरे घर वाले पढ़ लिए तो डंडा लेकर पिल परेंगे..
ये तो रही मजाक की बात.. वैसे अच्छा लिखा है..