रोने की जगह

रोने की जगह
दोस्तों हमारी जिंदगी में एक बार या रोज एक पल ऐसा जरूर आता है जिसमे हमे रोने बड़ी तीव्र इच्छा होती है पर सही जगह न मिलने की वजह से सॉलिड रीजन होने के बावजूद भी हम अपने दिल के अरमानो को आसुओ में नही बहा पाते।

तो मै बताता हूँ की कहाँ जाए और कैसे रोएँ

मैंने कुछ जगह ढूंढी है जो आपको बताना चाहता हूँ
उम्मीद है आपको पसंद आएँगी।

माँओं के लिए:
माँओं के लिए प्याज की पकोड़ी बनाते से पहले प्याज काटते वक्त रोना अच्छा होता है।
वैसे तो घरों में प्याज रोज कटती हैं पर इतनी भावुक कोन होगी जो महज एक प्याज काटने में ही रो पड़े।
और वैसे भी बिना वजह रोज रोज रोना अच्छा भी तो नही लगता
कपड़े धोते हुए रोने में भी कोई बुराई नही है। कोई पूछे तो कह सकती हैं की आँख में साबुन गिर गया था.

बहनों और प्रेमिकाओ के लिए:
- आंखों में काजल लगाते हुए
- रात को खाना खाने के बाद छत पर घूमते हुए
- घर अगर ५ या उससे ज्यादा वी मंजिल पर हो तो सीढिया चढ़ते हुए
- कोई फ़िल्म (इमोशनल) देखते हुए अब चूकि इमोशनल फ़िल्म है तो किसी को रोने का असली कारण भी पता नही चल पायेगा.

बापों के लिए:
बापों के लिए सबसे बढ़िया जगह होती है बाजार की भीड़ में, सब्जी मंडी में, दूध लाते हुए।
चूँकि बाप जब रोते हैं तो आवाज नही होती और कभी कभी तो आसूं भी नही आते तो उनके लिए खुले में रोना सही और सेफ रहता है और घर में रोने की जगह नही होती(घर में केवल माये रो सकती हैं) तो उनके लिए कोई और आप्शन भी तो नही बचता।

भाइयों प्रेमिओं और बाकि बचे हुए सभी रोने की इच्चा रखने वालों के लिए:
ये एक ऐसा वर्ग है जो सबसे ज्यादा रोता है और इतनी सफाई से रोता है की किसी को कानो कान ख़बर नही होती.
कुछ तो हसते हुए भी रोते पाए गए हैं।
अब चूकि इस वर्ग में ज्यादा लोग बलोंग करते हैं तो जगह भी ज्यादा ही होनी चाहिए। मदद हाजिर है।
- सोने के बाद और उठने से पहले, पर इतना धयान रखें की तकिया गीला न होने पाए नही तो पता चलने का खतरा रहता है
- बाथरूम में नहाते वक्त, सबसे सेफ और बेहतरीन जगह मानी गई है कारण कई हैं मै बताता हूँ
एक तो चूँकि इस वर्ग के लोगो(मै भी इसी वर्ग में आता हूँ) को फूट फूट कर रोने का शोक होता है, तो फव्वारे की आबाज से शोर का पता नही चलेगा और पानी से आसुओं का।
और दुसरे सुबह सुबह रोने से दिन भर हल्का फील होता है और काम में भी मन लगता है नही तो सारे दिन यही टीस लगी रहती है की क्या यार आज तो रो भी नही पाया।
- इस वर्ग के लोग रोज ऑफिस जाते हैं तो रास्ते में कई एसी जगह मिल जाएँगी जहा ये काम किया जा सकता है जैसे अगर बस में जा रहे हो और बस खली सी हो तो आखरी सीट पे आराम से कमर लगाकर भी सफर का आनंद लेते हुए रोया जा सकता है

- लिफ्ट में, पर इतना धयान रखे की माहोल पहले से तैयार रखे क्योकि समय कम मिलेगा।

- मोटर साइकिल पर पीछे बैठे हुए (लोग सोचेंगे की हवा की वजह से आँखों में पानी आ गया होगा)

माँओं से विशेष रूप से माफ़ी चाहूँगा उनके लिए जगह कम हैं और वजह अधिक
मैंने कोई जगह न छूटे इसका पूरा धयान रखा है और अपनी तरफ़ से पूरा प्रयास भी पर फिर भी अगर कोई जगह छुट गई हो तो मुझे बताएं.

बाप भाई और प्रेमी भी अपने सुझाव दे सकते हैं

5 comments:

manoj said...

marmikta ko chhuta hua bahut se sundar lekh

ताऊ रामपुरिया said...

भाई प्रशांत जी , आपने बड़ी सुंदर जगह बताई हैं रोने के लिए ! एक जगह छुट गई शायद ! डाइनिंग टेबल पर तेज लाल मिर्च की
हरयाणवी चटनी के साथ डिनर करते वक्त भी ये शौक पूरा किया जा सकता है ! लाल मिर्च की चटनी है तो बहाने बाजी में भी आसानी रहेगी ! :) भाई बहुत सुंदर पोस्ट ! धन्यवाद आपका !

भूतनाथ said...

हम तो भूत हो चुके ! हमारे तो अब आंसू भी सुख चुके हैं ! अलबत्ता आपने बताया है तो कोशीश कर देखेंगे !
क्योंकि रोना भी सेहत के लिए जरुरी है ! और हमें तो सदियाँ गुजर गई हैं रोये हुए !
बहुत अच्छी रचना ! बधाई !

भवेश झा said...

sach hai bhai saheb, dhnyabad

PD said...

बू हूँ हूँ हूँ..
मुझे रोने के लिए आपका चिटठा ही पसंद आया..
चलेगा न?? ;)