हैप्पी न्यू ईयर

नए साल का पहला दिन है और मैं अपने कमरे में अकेला पड़ा हुआ हूँ। फेफड़ों से आने वाली ओर जाने वाली साँसों को सुना जा सके ऐसी खामोशी है। दीवारें मेरे वक़्त पर हँस रहीं हैं। ओर मैं उनके सिर पर रखे छत के बोझ पर। एक पंखा लगा है जो बंद है मेरे रास्तों की तरह । ये रात ओर आगे आने वाली रातें कैसे कटेंगी देखना होगा। कई फ़ोन आये दिन भर, ओर मैसेज भी, पर उनका कोई मतलब नही था। इस ज़िंदगी की कल्पना मैंने नही की थी। खैर। अपना नया वर्ष कुछ वक्त शायद और लेगा। या फिर अगला जन्म तक का समय।

रात के 10 बज चुके हैं। 2 ठंडी रोटी पेट में रख ली हैं, थोड़ी सी सब्जी, 4 प्याज के कत्ले 1 गिलास पानी। किसी ने पूछा नही की क्या खाया, मैं सोच रहा हूँ कि क्यों खाया। पर्दों में 24 सलवटें हैं। जितनी ज्यादा सलवटें उतनी अमीरी। इतना खालीपन है कि सोच रहा हूँ अपनी कहानी दीवारों को सुना दूँ। फिर दीवारें रोती रहेंगी मैं सोता रहूंगा।

एक कमरा, एक पंखा, एक छत, एक ट्यूब लाइट, एक बेड, एक तकिया, एक गिलास, एक मैं।। किसी का इंतजार करता हुआ, किसी न हो सकने वाली चीज का इंतजार, आप किसी का इंतज़ार कीजिए , अनंत समय तक, वे भूल जाएँगे आना, फ़ोन करना या sms करना भी, आप उनसे बात कीजिये , वे फिर भी भूल जाएँगे, किसी रोज़ वे यह भी भूल जाएँगे कि आप उन्हें भूल गए हैं । कितना आसान है कितनी छोटी बात। मैसेज सीन करके छोड़ देना, हम्म पे बात खत्म कर देना, हर बात का जवाब ओके, वो भी 82 मिनट बाद, ये सब मना कर देना ही होता है। बिना पूछी बातों का भी जवाब मिल जाये ऐसी दुनिया मे जाना है।

आंखे खोल कर सोना सीख लिया है, आंसू को निकलने में आसानी होती है। रास्ता मिल जाता है।

सोसाइटी में इतने ऊंचे टावर बनाए इन्होंने। खुली बालकनी बनाई, शायद मेरे जैसे लोगों का काम आसान करने के लिए।  अकेला आदमी अगर 12th फ्लोर से  बालकॉनी में घूमें रात को । किसी को पता नही चलेगा, सब सोचेंगे शायद गमलों में पानी देते हुए पैर फिशल गया होगा। किसी चीज को शुरू करना मुश्किल होता है। खत्म करना आसान।

मैं आसान रास्ता चुन रहा हूँ।

आप सबको आपके नए वर्ष की शुभकामनाएं।

एनिमल 2023 रिव्यु

एनिमल, अपने नाम को सार्थक करती हुई फ़िल्म। 

सच में, हर इंसान जब पैदा होता है तो एक जानवर ही होता है। प्यार, माँ बाप, परिवार, समाज ओर शिक्षा उसे इंसान बनाती है। इनमे से कुछ  न मिले तो बुरा इंसान ओर कुछ भी न मिले तो वो जानवर बन जाता है। ये फ़िल्म यही सिखाती है।

बच्चे को इग्नोर करना इतना हिंशक होता है ये सिखाती है ये फ़िल्म। इस सच्चे जहर को पीना चाहते हो तो देखो। समय दो रिश्तों के बीच की चुप्पी को इतना खतरनाक बना देता है ये पचा सकते हो तो देखो।

अपने समय की फिल्मों से 10 कदम आगे, क्लासिक, बोल्ड, निडरता से कही गयी कहानी। बिना लाग लपेट के, बिना मुखोटा लगा, बिना किसी डर के प्लैन वनीला सिनेमा दिखानी की जिद। हैट्स ऑफ टू डायरेक्टर।

साइलेंट हिंसा क्या होती है ये इस मूवी से सीखो। जो हम सब करते है अपने बच्चों से, अपने माँ बाप से, अपने हर उस सख्श से जिसको हमसे कुछ उम्मीद है। ओर ये इग्नोरेंस आदमी को कैसा बना सकती है , सच मे हम सब ऐसे ही हैं कुछ कम कुछ ज्यादा। अनिल कपूर हैरान, क्रोधित होकर पत्नी पर चीखता है - "हमने एक क्रिमिनल पैदा किया है". लेकिन वो पैदा ऐसे नहीं हुआ होता है. वो बनाया है।

वो बच्चा डीसेंसेटाइज़ किया जाता है - माँ, पिता का इंतजार करते करते, उसके टाइम ओर प्यार को तरसते और कभी न पाते हुए, पैसा, अमीरी. पिता से पिटता है, जीजा जी से इनसल्ट, टीचर डंडे मारती है मामूली बात पर. रोंगटे खड़े करने वाला एक दृश्य है जहां टीनएजर बेटे रणविजय को बलबीर थप्पड़ें पर थप्पड़ें मारता है. 


स्ट्रांग ओपिनियन हर चीज को लेकर। ये जानवर हम ही बना रहे हैं, जाने अनजाने, ओर बाद में हम ही बोलते हैं कि बेकार है, illogical है, extream है। कभी सोचा है अकेलापन कितना एक्सट्रीम होता है,  अपनी बात न कह पाना कितना एक्सट्रीम होता है, चेहरे पे हंसी लाना जबकि अंदर दुखों का समंदर हो कितना illogical होता है। 

नही सोचा।

हिसाब बराबर

उसने रोटियां दी सेककर
नमकीन सपने दिए
बाजार दिए, दुपट्टे, बिंदी और बेमतलब की बातें दी
मैंने साढ़े तीन मिनट प्यार दिया

वो कहती की जब मेरे पास बैठती है
तो उसका मुँह कड़वा हो जाता है

मुझे बोरिंग आदमी बोलती थी
वही बोरिंग जिसकी छटी गर्लफ्रेंड ने
उससे "लगभग" शादी कर ली थी

जिओ ने सब कुछ फ्री कर दिया था
पर प्यार करने के पैसे देने पड़ते थे "एडवांस"
मुझे बड़ा आदमी बनना था
उसको माधुरी दीक्षित बनना था
उसकी शादी हुई तो सुकून मिला

उधार

१. रोज पीता हूँ बस जेब खाली होने तक
उधार की तो कभी टॉफियाँ भी नहीं खाई थी.

२. फेसबुक पोस्ट पे लाइक न आने के गम में भी पी लेता हूँ 
घाव की गहराई के अनुपात में ग़मजदा होना नहीं सीखा।

 

फेसबुक के ग्रुप फ़ोटो पर आये लाइक की कच्ची खुशी

अनाज कमाने घरों से भागे हम
अशर्फियाँ पाकर भी वापस क्यूँ नही लौट पा रहे
ये कहो ना प्यार है वाले टाइम कि बात थी
रहने वाले अपने मकान और न रहने वाले दूसरे के मकान के बीच
80 किलोमीटर लम्बी GT रोड
और चार पांच नजरें ना मिला सकने वाले मोड़
फ्रिज भी कब तक हमें बासी होने से बचाएगा
जी सिनेमा वहाँ भी आता है
और धूम 3 भी
इन कमरों में, जिनकी छतें भी रोने के आकर की बनायीं गयी हैं
एक बाल्टी पानी, 2 घंटे जिन्दा बचे रहने का हौसला देता है


यहाँ कुँआ होता तो तकलीफ़ थोड़ी कम होती
फेसबुक के ग्रुप फ़ोटो पर आये लाइक की कच्ची खुशी
या दिव्या भारती की सुपरहिट पिक्चर
फ़ैसला हमारे हाथों में हैं


एजाज़ पेंटर

अभी तुम इतने अच्छे दोस्त नहीं हुए
कि अँधेरे में तुम्हे फटा नोट ना पकड़ा सकूँ
बारिश भी हर बार हुई
और मैं हर बार हंसा गोविंदा वाली हंसी
फूट फूट कर
नंगे पैर, रेगिस्तान, ऊपर धुप
और क्या चाहिए जिन्दा रहने के लिए
शहर में शनिवार है
एजाज़ पेंटर से एक किलो "प्यार" ले आओ
कल दुकानें बंद रहेंगी
मैं शहद भरी कवितायेँ नहीं लिखता (अब)
अपना गुड साथ लेके आना

मौसम नौवीं क्लास की लड़की जैसा था


मैंने नदी का हाथ पकड़ के जिंदगी को देखा
तुमने रेलवे स्टेशन पे बैठकर
नशा आँखों में था या बातों में
ठीक से याद नहीं
अंधेरा तेरे गाल के कुए जितना था
(जहाँ मैंने कपडे धोए अक्सर और पलकों पे सुखाये)
और मौसम नौवीं क्लास की लड़की जैसा
आगे याद नहीं या मैं बताना नहीं चाहता