एक कटोरी हवा

बड़ा बनने का सोचना ही कितना गलत रास्ता है। मुझे ऐसा इंसान बनना है, की कोई मुझसे मिलकर लौटे, तो अपने घर मे मेरी बात करे, अपने बच्चों से, भाई बहनों से मेरे सादेपन की बात बताये, कोई मेरे घर से लौटे तो इतना सारा सादापन लेकर लौटे जो कई महीनों तक चले उसके साथ।  

ओर मेरी बातें कानों से रिसकर जहन तक पहुंचे और वहीं बस जाए

जैसे रिटायर होकर लोग बस जाते हैं पहाड़ों पर जाकर।

हमेशा सोचता था कि बड़ा आदमी बनूँगा, अमीर आदमी। अमीर होने का सोचना, यह दिशा ही कितनी गलत है, असल में सादा हो जाने का सोचना चाहिए। इतना सादा कि जब शब्द इतने सलीक़े से धीरे धीरे रखे जाएँ कि कहीं पन्ने को चोट न लग जाये। शब्द ओर पन्ने के बीच बहुत गहरा रिश्ता है 

पढ़ने वाले को शब्द जब समझ नही आते तो वो पन्नो से उसकी बुराई करते हैं।

मुझे भी इतना धीमा बोलना ओर मुस्कुराते हुए बोलना है की, जब शब्द मुँह से बाहर निकलें तो हवा को चोट न लगे, मैं अपने आप को दुनिया  में लोगों के सामने ऐसे रखूंगा कि ज़मीन को चोट ना लग जाए। बड़ा होकर नही बच्चा होकर जीना है ।

हवा चल रही है ठंडी

ज्यादा नही बस थोड़ी सी

थोड़ी सी का अलग मजा है

पूरा होने पर अलगाव का रिस्क रहता है। हवा ऐसी है

जो किसी को चोट नही पहुंचा रही

न चाँद किसी को चोट पहुंचाता

धरती भी कभी नही सोचती की ओर बड़ी हो जाऊं ओर चोट पहुंचाने वाली बात करूं

नदी पहाड़ पेड़ बर्फ सब एक जैसा ही सोचते हैं

ओरिजिनल होकर जीना कितना आसान है, कितना सादा, कितना सरल।

मुसीबत आने पर पता चलता है कि हमें क्या चाहिए

सच मे कुछ चाहिए ही नही

घर, 2 रोटी, एक कटोरी ठंडी हवा

दो घूंट धूप

बिना बताए समझने वाले 2 4 लोग

प्लास्टिक के जैसी नपी तुली हँसी से दूर

पानी के जैसी ओरिजिनल हँसी

होठों से नही आंखों से

बिकॉज़ होटों से हँसने पर आवाज आती है

इतनी अंडरस्टैंडिंग मुझे बनानी है जितनी चाँद ओर तारों के बीच की है

बिना जोर से बोले एक दुसरे को बता देते हैं

की चल भाई मेरी ड्यूटी खत्म, तेरी शुरू

नही चांद ओर सूरज एक्चुअली


मुझे कुछ समय के लिए उन सारे पागलपन से दूर जाना है

जो एक स्ट्रक्चर की तरफ ले जा रहे हैं, की कैसे उठना है, कैसे बैठना है, हँसने पर कितना मुँह खुलना चाहिए क्योंकि ऐसे मैं पागल हो जाऊंगा,

ज्यादा नही तो थोड़ा तो जरूर

अपनी भूमिका के साथ भ्रमित हो जाऊंगा, यह सोचकर कि वो ही मेरी असली पहचान है

जोकि है नही 

मैं अपनी भूमिका नहीं हूं, अपना कैरेक्टर नही हूँ 

उससे कहीं गहरा हूँ

इसलिए मुझे जंगल, घने काले जंगल में जाना है या कहीं भी अकेले

प्राकृतिक स्थान पर जाना है, अपने आप से बात करनी है

और पता लगाना है कि मैं वास्तव में कौन हूँ

ओर अगर ऐसा हो पायेगा तो कितनी सरल बात होगी, जो ये बताएगी की मैं कुछ हूँ ही नही

वो लड़का जो आदमी बन गया

 वो लड़का

जो दुनिया की नजर में

आदमी बन चुका है

असल में एक बच्चा है।

जो लोगों की भीड़ में,

मंडी में,

किराने की दुकान में,

मेडिकल स्टोर में,

सबसे ज़्यादा दिखता है

असल में सबसे ज़्यादा 

अकेला है।


उसकी ज़िंदगी नही है कोई शायरी 

जहाँ हर दर्द पे मिली तालियाँ 

वो है एक joke

जिसकी बात पे हंसते हैं सब

ओर

उसकी ज़िंदगी है

एक एक्सेल शीट 

जहाँ हर 30 तारीख

पकड़नी होती है मुश्किल

जो रोज चेक करता है

बैंक एकाउंट

ओर लड़ लेता है घर में

वीकेंड पर

ताकि मार्किट ना जाने पड़े

ताकि कम खर्च हो


वो जान चुका है

कि कैसे हो पूछने वाले लोग

कोन हो पूछने लगे हैं

और कैसे हो पूछने वाले हाथ

अक्सर linkedin देखने के बाद बढ़ते हैं


उसका फोन हर वक़्त हाथ में रहता है ओर wifi ओंन

पर फिर भी

कोई ऐसा sms नोटिफिकेशन नहीं 

जिसमें लिखा हो "ठीक हो?”

2 3 साल हो गए शायद

"कैसे हो?" लिखा व्हाट्सएप आये भी


उसने अब अरमानों को पिन नहीं करता वॉल पर

वो जाता है शॉपिंग करने

बस सब्जी मंडी

लाता है हरी भरी ताजी सब्जी

फल जैसे सेब केले अनार

ओर खाता है रोटी अचार

सपनो को करता है सेव

 फ़ोल्डर में 

“Pending after fee EMI and bills” नाम से

वो चुप है आज

पर

हंसता है तो चीख चीख कर

ताकि सबको सुनाई दे

की खुश है सब सही है

उसकी चुप्पी कोई कमजोरी नहीं 

वो बस जानता है

कि हर बात का इलाज

संभब नही

कोई अगर कंधे पर सिर नही रखवाता

कोई बात नही

खुद की पीठ थपथपा लेता है


अब वो आईने में मुस्कुराता नहीं

बस देखता है

बाल ज्यादा सफेद तो नही

ओर

चेहरा थका हुआ तो नहीं


उसे पता है

कि हर सुबह ‘गुड मॉर्निंग’ नहीं होती

बस बोलने के लिए बोल देता है

गुड मॉर्निंग

अपने बगल में बैठने वालों को

चाहे हो ना

कुछ सुबहें बस होती हैं.

स्कूल तक जाने

ऑफिस तक जाने

ओर वापस आने के लिए


उसने सीखा है 

कि अकेलापन कोई दुश्मन नहीं

दोस्त है


वो लड़का

अब किसी से शिकायत नहीं करता

बस हंस देता है

फुट फुट कर

ओर हँसते हँसते जब

आंखें हो जाती है लाल

तो धो लेता है मुँह

बोलकर की कितना पॉल्युशन है

गुड़गांव में

सैयारा, आपके तानो से जीतकर आगे बढ़ने वाली पिक्चर

क्या आपने कभी सोचा है कि फिल्म ‘सैयारा’ सुपरहिट या ब्लॉकबस्टर कैसे बन गई?

आप सबके तानो की वजह से , सबके मना करने की वजह से, आप जैसे 30+ 40+ ऐज ग्रुप जो अपने को ज्यादा mature समझ रहे हैं, इलीट क्लास समझ रहे हैं उनको आईना दिखाया है इसने

ये बस एक 15-25 ऐज ग्रुप वाली सोच की फेक 30+ वाली सोच से लड़ाई है जिसमे पहले वाला ग्रुप जीत गया है। 

पहला ग्रुप मतलब, शुद्ध , बिना मसाले वाला, बिना दिमाग, बिना जजमेंट वाला प्यार। चाहे कहानी हो , गाने हों या अभियन, सब कुछ प्यूर सब कुछ ओरिजिनल 

दूध जैसी सच्ची, नदी जैसा अविरल बहने वाली कहानी

जब रणबीर कपूर की ‘एनिमल’ हिट हुई थी, तब भी आप जैसे बहुत से लोग चौंके थे इतनी हिंसक, नायक के चरित्र में कई खामियां, इतना खून खराबा, फिर भी फिल्म सफल? 

क्योकि बिना लाग लपेट के प्लैन वनीला मूवी ऐसी ही बनती है

या एनिमल या फिर ये। बीच का कोई रास्ता नही।

अब वही सवाल ‘सैयारा’ को लेकर उठ रहा है। दरअसल, ये दोनों फिल्में आज की युवा पीढ़ी खासतौर पर जेन Z और मिलेनियल्स के दिमाग को बखूबी समझती हैं।

अब बात ‘सैयारा’ की करें, तो ट्रेलर ने ही बता दिया था कि यह फिल्म 20+ के दिलों को छूने वाली है। जो बस मूवी इसलिए देखने जाते हैं कि मूवी देखनी है। फिल्म का हीरो मीडिया में फैले पक्षपात के खिलाफ आवाज उठाता है 

पेड रिव्यूज से मूवी हिट करवाई जा रही है, शो हिट करवाये जा रहे हैं। nepotism की बात भी रखी गयी है। वहीं सच्ची समीक्षाएं चुपचाप किनारे खड़ी हैं। फिल्म में एक संवाद है, "तयशुदा सवालों पर इंटरव्यू करना अब अच्छा नहीं लगता", जो आज के टाइम का कड़वा सच उजागर करता है।

अहान पांडे जरूर फिल्मी बैकग्राउंड से आते हैं, लेकिन अनीत पड्डा का कोई ऐसा बैकग्राउंड नही है 20 22 साल की एक्ट्रेस है दोनों की एक्टिंग अच्छी है।

आज कल की जनरेशन गलत को गलत कहने की हिम्मत रखते हैं

 नायक सिगरेट पीने की कोशिश करता है, तो नायिका साफ मना करती है, और जब नायक गाली देता है, तो वह भाषा पर आपत्ति जताती है। वह रात में काम न करने की शर्त भी रखती है। यही चीज युवा दर्शकों को भा रही है। मुह पर बोलो साफ बोलो काम से काम रखो काम करो पैसा कमाओ बस।

कुछ लोग कह रहे हैं कि ‘सैयारा’ कोरियन फिल्म ‘A Moment to Remember’ की कॉपी है। मैंने वो फिल्म नहीं देखी, इसलिए तुलना करना उचित नहीं है ओर आज के टाइम में तो प्यार भी लोग कॉपी करके करते हैं, inspire होकर।

तो अगली बार जब आप ‘सैयारा’ या ऐसी किसी फिल्म को देखें, तो यह ज़रूर सोचें कि वह किसकी कहानी कह रही है। आपको पसंद नही आई तो इससे ये सिद्ध नही हो जाता कि फ्लॉप है या बेकार है। और मुझे पसंद आई इससे भी ये सिद्ध नही हो जाता है कि अच्छी है

जाओ देखने तो अपने पैसे, पद, ईगो, रुतबा, ओर झूठी इमेज को घर ऱखकर जाओ, यकीन मानो अच्छी लगेगी फिर। बच्चे बनकर जाओ देखने, वह बच्चा जिसको कुछ नही पता ।

शुद्ध रोमांस, एक दो सीन को छोड़कर पारिवारिक फ़िल्म मजबूरी, दर्द, प्यार  पैसा और कैरियर के बीच में फंसे लोगों की कहानी। 

लाइफ एडवाइस

 मेरी बेटी

कभी मत झाँकना

गहरे काले कुँए में

(काले दिल वाले लोगों के दिलों में भी, पर पता कैसे चलेगा?

मैं बता दूंगा

चल जाता है

उतर जाता है रंग

कुछ दिनों में)

कभी मत पहनना

काले कपड़े

ओर ऐसे भी की

असहज लगे ख़ुद को भी

ओर बहुत बारीक कपड़े भी

ओर दूर रहना

बिना वजह

गिफ्ट चॉकलेट ओर फूल

देने वाले लोगों से भी

हमेशा पूछना की क्यों

ओर जब वो कहे ऐसे ही

तो मत लेना

100 सवाल पूछना

तभी लेना जब कन्विंस कर पाए

जो पहली नजर में अच्छा लगे उससे भी

मेरी बेटी मत करना बात

जो पिज़्ज़ा

मैक्रोनी की बात करता हो

कॉफ़ी की बात करता हो

हाँ

रोटी और emi की बात 

ओर बोरिंग बात करने वाले से ही करना बात


जाना

पर उस ओर कभी मत जाना

जिधर खड़े हों

काले-काले कुत्ते

सुवर, सांप

ओर आ रही हो बदबू

(ओर मैं उस बदबू की बात नही कर रहा

जो सूंघने से आ जाती है)

लाल ओर सफेद फूल

हरा पत्ता

कभी मत तोड़ना

(किसी का देखा हुआ सपना भी

ओर ना सपने पे हंसने को बोल रहा)

और अगर तोड़ना तो ऐसे

कि पेड़ को बेल को ज़रा भी

न हो कष्ट

ओर पेड़ को बात देना की क्यों तोड़ा

ओर अगर वो कन्विंस हो जाये तभी तोड़ना

दिल भी तोड़ना तो बता कर

की क्यों तोड़ा

मेरी बेटी

रात को रोटी का टुकड़ा

जब भी तोड़ना

सब्जी में, दाल में भिगोने के लिए

तो पहले हाथ जोड़कर 

कर लेना याद उस आदमी को

जिसने सबसे पहले

बताया होगा कि यही खाना है

ओर उस औरत को भी जो

बना रही है पसीने में भीगकर रोटी

ओर उसको भी, जो भीगी हुई है

सुनकर बॉस की गालियाँ

(जो रोज पड़ने पर गालियां नही लगती)


मेरी बेटी

अगर कभी घर में लाल चींटियाँ

दिखाई पड़ें किचन में

तो भगाना मत उनको

तो समझना

बेइंतहा पैसा आने वाला है

चारों तरफ से


अगर कई-कई रातों तक

कभी ना आये नींद

तो मुझे जरूर बताना बात

ओर सो जाना

पर कभी ये मत सोचना की

बुरे दिन आने वाले हैं

ओर कोई नही है तुम्हारे साथ


मेरी बेटी

पहाड़ पर चढ़कर कभी मत गिरना

(पहाड़ मतलब? मतबल जब जेब भर जाएं, पेट भर जाए, ओर आदमी को आदमी समझना बंद कर दो)

और कभी गिर भी पड़ो

तो घास की तरह उठने के लिए

(घास मतलब? Down to earth)

हमेशा रहना रेडी

मेरी बेटी

कभी अकेले फंस जाना अगर अँधेरे में

अगर भूल जाना रास्ता

तो गूगल मैप पर नहीं

सिर्फ़ बहुत दूर से आनेवाली

कुत्तों के भोकने की आवाज़ पर

भरोसा करना ओर मुझे याद करना

स्कूल की छत से कूद मत जाना


मेरी बेटी

अगर होमवर्क ना हो

अगर एग्जाम की तैयारी ठीक से ना हो

अगर स्कूल में कोई परेसानी हो

तो बताना जरूर


और सबसे बड़ी बात मेरी बेटी

कि सुन चुकने के बाद

दिन भर सबकी कड़वी बातें

उन चुभने वाले शब्दों को

पोंछकर साफ़ कर देना


ताकि कल जब फिर से दिन निकले

सुबह हो

तो तुम्हारा मन

नया, 

धुला हुआ, खुशबूदार

स्वच्छ

ओर चमकता मिले

ओर चेहरे पर मुस्कान

इतनी प्यारी की

आस पास महक जाए खुश्बू

ओर खिल उठें फूल

जो बस इसी बात का कर रहे थे wait

ओर चाय जरूर पिलाना बनाकर मुझे

जब बड़ी हो जाना

पर इतनी बड़ी कभी ना होना

की मैं जब रोना चाहूँ गले लगकर तुम्हारे

तो मुझे लगानी पड़े सीढ़ी

लाइफ एडवाइस

मेरे दोस्त

कभी मत झाँकना

गहरे काले कुँए में

(काले दिल वाले लोगों के दिलों में भी, पर पता कैसे चलेगा?

मैं बता दूंगा

चल जाता है

उतर जाता है रंग

कुछ दिनों में)

कभी मत पहनना

काले कपड़े

ओर बहुत बारीक कपड़े भी

ओर दूर रहना

बिना वजह

गिफ्ट चॉकलेट ओर फूल

देने वाले लोगों से भी


जाना

पर उस ओर कभी मत जाना

जिधर खड़े हों

काले-काले कुत्ते

सुवर, सांप

ओर आ रही हो बदबू

(ओर मैं उस बदबू की बात नही कर रहा

जो सूंघने से आ जाती है)

लाल ओर सफेद फूल

हरा पत्ता

कभी मत तोड़ना

(किसी का देखा हुआ सपना भी

ओर ना सपने पे हंसने को बोल रहा)

और अगर तोड़ना तो ऐसे

कि पेड़ को बेल को ज़रा भी

न हो कष्ट

ओर पेड़ को बात देना की क्यों तोड़ा


रात को रोटी का टुकड़ा

जब भी तोड़ना

सब्जी में, दाल में भिगोने के लिए

तो पहले हाथ जोड़कर 

कर लेना याद उस आदमी को

जिसने सबसे पहले

बताया होगा कि यही खाना है

ओर उस औरत को भी जो

बना रही है पसीने में भीगकर रोटी

ओर उसको भी, जो भीगी हुई है

सुनकर बॉस की गालियाँ

(जो रोज पड़ने पर गालियां नही लगती)

और कर लेना याद

उसको जिसने अभी तक नही खाया खाना

तुम्हारी याद में नहीं

बल्कि इसलिए

क्योकि तुम्हारे बोले शब्द

उसके ह्रदय में चुभ रहे है

वही नार्मल से शब्द

जो ऐसे ही बोल दिए थे lightly

चाय पीते पीते की chatgpt 

से आसान हो जाता है

झूठी तारीफ़ करना।


अगर कभी घर में लाल चींटियाँ

दिखाई पड़ें किचन में

तो भगाना मत उनको

तो समझना

बेइंतहा पैसा आने वाला है

चारों तरफ से


अगर कई-कई रातों तक

कभी ना आये नींद

तो  passiflora incarnata

ले आना, या मंगा लेना

ओर सो जाना

पर कभी ये मत सोचना की

बुरे दिन आने वाले हैं


मेरे दोस्त

पहाड़ पर चढ़कर कभी मत गिरना

(पहाड़ मतलब? मतबल जब जेब भर जाएं, पेट भर जाए, ओर आदमी को आदमी समझना बंद कर दो)

और कभी गिर भी पड़ो

तो घास की तरह उठने के लिए

(घास मतलब? Down to earth)

हमेशा रहना रेडी


कभी अकेले फंस जाना अगर अँधेरे में

अगर भूल जाना रास्ता

तो गूगल मैप पर नहीं

सिर्फ़ बहुत दूर से आनेवाली

कुत्तों के भोकने की आवाज़ पर

भरोसा करना ओर मुझे याद करना


मेरे दोस्त

बुध को पार्टी में कभी मत जाना

और इतवार की रात को अच्छे से जल्दी सो जाना


और सबसे बड़ी बात मेरे दोस्त

कि सुन चुकने के बाद

दिन भर बॉस के ताने


उन चुभने वाले शब्दों को पोंछकर साफ़ कर देना


ताकि कल जब फिर से दिन निकले

सुबह हो

तो तुम्हारा मन

नया, 

धुला हुआ, खुशबूदार

स्वच्छ

ओर चमकता मिले

ओर चेहरे पर मुस्कान

इतनी प्यारी की

आस पास महक जाए खुश्बू

ओर खिल उठें फूल

जो बस इसी बात का कर रहे थे wait

ओर चाय जरूर पीना बनाकर सुबह

ग़लती और माफी

सब कुछ पहले जैसा ना हो पाने का गम

आंखें नम

चुभने लगा है अब 

तुम्हारा

ना बोल के सब बोल देना

ओर ये बोल देना की सब ok है

ये घड़ी की सुईं

जो आगे नही बढ़ रही 3 दिनों से

हर पल हर लम्हा

इसी आस में की

कौन सा जतन, कौन सी बात

तुम्हे दोबारा मेरे उतने पास लेके आएगी

क्या चीज होगी, जो माफी देगी

जो तुम्हे मेरे फिर से गले लगा देगी

जिससे हमारे बीच बने मूक संबंध

जिसको तुम बोल रहे हो कि सब ठीक है (जोकि है नही)

अपनी सीमाओं को लांघकर

प्रेम की अविरल धारा में बह जाएंगे

क्या तुम भी नहीं बहा सकती

अब मेरे सारे दोष

जैसे नदी बहा ले जाती है

सारे पाप अपने साथ

तुम्हे पता है कि पा लेने से कहीं ऊपर

ओर खो देने के भय के तले

बसता है मेरा प्रेम तुम्हारे लिए

मेरे पास कोई मायका नही है

ना दसवीं क्लास की कोई सहेली

जिसको बात सकूँ ये सब बातें

कि कैसा लगता है जब

मनाने वाली सारी बाते खत्म हो जाती हैं

ओर छा जाती है चेहरे पर 

उदासी की अदृश्य पटकथा

जिसको पढ़ने वाले ने फेरा हुआ है अपना मुँह

कौन पढ़ेगा ये बैचेनी

कौन देखेगा ना बहने वाले आँशु

कोंन करेगा वो टीस महसूस

जो फाड़ रही है दिल को

सुनो, एक वक्त के बात बातें खत्म हो जाती हैं

बस साथ मायने रखता है

तुम्हारे पैरों की धूल 

रोटी पर नमक की तरह लगा

ओर अश्कों को चुपड़कर घी की तरह

खाया है मैंने 

भूल गयी?

थका थका तन है

अशांत भटकता दिल दिमाग मन है

भावनाएं जैसे मर गई

कुछ तो गलत है

पर पता नही क्या

ओर पता नही कब सही होगा

बोलो?

एक ओर बात है जो कहनी है तुमसे

कि प्रेम की एक और definition है

कि मैं तुम्हे बिना बताए भी तुमसे प्रेम कर सकता हूँ

ओर कोई मुझे रोक नहीं सकता

उसके लिए मुझे कोई फैंसी बात नही बनानी

कोई दिखावा नही करना, कोई गिफ्ट नही

ये कितना सरल और आसान है

कितना पवित्र

बस यही एक रास्ता बचा है अब शायद

मेरे अंदर एक जंगल है

उदास घना गहरा

अनकही आवाजों का जंगल

उसको समझ ना पाओ

तो काटना भी मत






अधूरापन

अगस्त की एक आखिरी उदास शाम, एक अधूरेपन का एहसास लिए। लगता है शामें हमेशा से अधूरी ही रही, जब तक लगने को होता है की शाम है, तब तक रात होने लगती है।
जामनी बादल सांसे रोके पड़े हुए हैं और उनके पीछे से सूरज बेमन से ऐसे झांक रहा है जैसे उसे छिपने की जल्दी हो।
जिंदगी के उस पड़ाव पर हूँ शायद, की पीछे मुड़के देखता हूँ तो पाता हूँ कि मैं कुछ भी पूरा नहीं बन पाया। कभी कुछ पूरा नहीं कर पाया। ना प्यार, ना नफरत, ना बचत, ना फिजूलखर्ची, ना आवारापन और ना आज्ञाकारी ही। 

कभी ड्रिंक नहीं की, ना स्मोकिंग, न ड्रग्स, ना नॉनवेज (ये इतनी बड़ी चीजें नहीं लगी कभी वैसे जैसा आप लोगों ने बना रखी हैं) ना कभी 5 मिनट वाला प्यार किया। कभी न साथ छोड़ने वाला अधूरापन मेरा बेस्ट फ्रेंड बना रहा हमेशा। और मैं उस अधूरेपन को भी पूरा साथ, पूरा समय नहीं दे पाया। हमेशा ऐसा लगा की जो किया उससे अच्छा कर सकता था जितना खुश रहा उससे ज्यादा रह सकता था।

पर ये अधूरेपन का सुकून ही था जिसने कभी कुछ पूरा नहीं करने दिया और जिंदगी शायद ऐसा ही चाहती है, पूरा हुआ मतलब ख़तम हुआ।  

एक अच्छा बेटा बनना शायद कभी नहीं आया मेरे हिस्से. अच्छा भाई भी हो पाया ऐसा लगा नहीं कभी। कभी फेवरेट कलर, फ़ेवरेट मूवी, क्या होती है ऐसा डिस्कशन नहीं किया। कितने दोस्त हैं या कभी रहे भी या दोस्त किसे कहते है पता नहीं। दोस्त कहलाने का अधिकार खो चुका हूं।

किसी का पूरा प्रेमी बना भी या नहीं, पता नहीं। और अगर बना भी तो उसके हिस्से का प्रेम उसे दे पाया कि नहीं, इसका मूल्यांकन भी वही करेगी जिसे मैं थोड़ा बहुत भी मिला हूं। शायद 45% ही या उससे भी कम।

हर सुबह उठता हूं अधूरी नींद लिए आँखों में, और एक लिस्ट लिए दिमाग में की क्या करना है और कुछ पूरा कर पाने की जद्दोजहद में वह दिन और वो काम अधूरा छोड़कर सबकुछ करता हूं जिन्हें आप लोग जरुरी काम समझते हैं। किसी भी चीज का मन नहीं, उदास रहने में एक सुकून, एक कम्फर्ट, और खुश रहने में एफर्ट और एनर्जी वेस्टऐज ऐसा लगता है। क्यों हँसू मैं, क्या होगा उससे? क्यों भीगूँ बारिश में और क्यों बनूँ रोमांटिक?

मैं यह कभी तय नहीं कर पाया बचपन से ही कि मुझे फुर्सत के क्षण क्या करना है। पास्ट टाइम, ये क्या होता है? हॉबी, ये क्या होता है? जैसे लम्बे रुट की कोई पुरानी धीमी चलती बस, जो बस चलती ही जा रही है सबको पासिंग देती, बिना किसी डेस्टिनेशन की फिक्र किए। मानो कहीं रुकने का भी मन नहीं और कहीं पहुँचने की भी बेचैनी नहीं, जहां जाकर रुक जायेगी वही उसका गंतव्य होगा।  पानी की टंकी को भरता देखना मेरा काम था और भर जाने पर छत से चिल्लाना की भर गयी, एक घंटे तक एक छोटा बच्चा कैसे एक जगह बैठ सकता है?

मेरा स्वयं पर नियंत्रण नहीं रहा कभी, जिसने जहाँ धकेल दिया उसी तरफ चल पड़ा। मेरे हिस्से एक देह बची है और थोड़ी बहुत सूझ बूझ भी जिससे इतना तय कर पा रहा हूं कि दुखी होने पर थोड़ा रो लेना चाहिए, भूख लगने पर थोड़ा खा लेना चाहिए (जो भी मिले), प्यास लगने पर पी लेना चाहिए, किसी को हँसता देखकर हंसने जैसा मुँह कर लेना चाहिए और किसी के जबरदस्ती बात करने पर थोड़ी बात कर लेना चाहिए।

हाँ कुछ लोग अभी भी बचे हैं (जैसे तुम) जिसने बातें करने की इच्छा हमेशा बनी रहती है (पर कोई टॉपिक नहीं कोई बहाना नहीं) फिर भी ऐसा लगता है दिनचर्या का जरूरी हिस्सा हों। इन सबके इतर जीवन को जीने के कई और बहाने भी हैं। जैसे सब्जी लाना फल लाना होमवर्क करवाना लिफ्ट में कोई मिले तो हेलो बोल देना। जिनमें मैं आप को ज़िंदा पाता हूं रोज सुबह।

हर सुबह उठते ही मेरे ज़िंदा होने का एहसास होता है और मुझे लगता है कि मेरा होना तमाम निराशाओं, हताशाओं, आशाओं और उम्मीदों का समुच्चय है। जीवन कितना भी नीरस क्यों न लगे, मेरे हिस्से की खुशियां मुझसे नहीं छीन सकता ये भी है वैसे एक बात। इंसान भी पेड़ पौधों की तरह होते हैं खिलने और मुरझाने के समय फिक्स होते हैं। पर ये समय कितना भी उदास हो, आगे आने वाली खुशियों से तो कमजोर ही है। तुम मेरी सारी उमीदों को रोंद सकते हो, बाग़ के सारे फल फूल तोड़ सकते हो, सारे सपनों को झूठा ठहरा सकते हो, कह सकते हो कि इस अँधेरी गुफा का कोई अंत नहीं और मैं शायद मान भी लूँ पर बसंत को आने से कैसे रोक लोगे?
बोलो ?

बड़ा आदमी

कभी कभी मुझे होता है संदेह

कि मै भी दूसरो की तरह

हूँ एक साधारण आदमी

तो इस संदेह को दूर

करने के लिए मैं

रख लेता हूँ किसी को नोकरी पर

2000 Rs महीना।

किसी को ऐसे डाँटता हूँ 

कि वह काँपने लगता है।

किसी की तरफ उंगली करके आर्डर देके,

किसी को सबके सामने डांट के

किसी को वेट करवा के

किसी का फ़ोन काट के

वेटर को, कस्टमर केअर को गुस्सा करके

बन जाता हूँ असाधारण।

पाल लेता हूँ कुत्ता

रास्ते में खाता हूं सेब

कितना आसान है

सभ्य बनना, बडा आदमी बनना, अमीर बनना।

किसी को दरवाजे के बाहर 

इतनी देर तक खड़ा रखता हूँ

कि वह अपमानित होकर 

चुपचाप चला जाता है।

रेड लाइट पे शीशा नीचे ही नही करता।

डिलीवरी वाले की तरफ बिना देखे

ले लेता हूँ सामान

ओर कर देता हूँ गेट बंद उसके मुंह पर

4 डिग्री टेम्प्रेचर पे करवाता हूँ

कार साफ

लगवाता हूँ पोछा

ओर बन जाता हूँ

बड़ा आदमी।


नियम

हर चीज के नियम बनाये उन्होंने

पढ़ने के, आफिस आने जाने के

लड़कियों का

कितना मुँह खुला होना चाहिए

खाना खाते वक़्त, हँसते वक़्त

कितनी जोर से हँसना है

बाल संवारने का भी नियम है

कैसे ओर कितने कपड़े पहनने हैं

प्यार करने के भी नियम हैं।

लड़को को 

हमेशा खड़ा रहना है

मेट्रो में, फ़ोटो में पीछे की तरफ

माँ के ऑपरेशन में ओ टी के बाहर

बहन के साथ रेलवे स्टेशन पर

भारी बैग पकड़कर

पर इंसान के गिरने का कोई नियम नही बनाया

किसी के बदल जाने का

दर्द के होने का

बिना आँसुओं के रोने का

किसी के असमय खोने का

कोई नियम नही बनाया



हैप्पी न्यू ईयर

नए साल का पहला दिन है और मैं अपने कमरे में अकेला पड़ा हुआ हूँ। फेफड़ों से आने वाली ओर जाने वाली साँसों को सुना जा सके ऐसी खामोशी है। दीवारें मेरे वक़्त पर हँस रहीं हैं। ओर मैं उनके सिर पर रखे छत के बोझ पर। एक पंखा लगा है जो बंद है मेरे रास्तों की तरह । ये रात ओर आगे आने वाली रातें कैसे कटेंगी देखना होगा। कई फ़ोन आये दिन भर, ओर मैसेज भी, पर उनका कोई मतलब नही था। इस ज़िंदगी की कल्पना मैंने नही की थी। खैर। अपना नया वर्ष कुछ वक्त शायद और लेगा। या फिर अगला जन्म तक का समय।

रात के 10 बज चुके हैं। 2 ठंडी रोटी पेट में रख ली हैं, थोड़ी सी सब्जी, 4 प्याज के कत्ले 1 गिलास पानी। किसी ने पूछा नही की क्या खाया, मैं सोच रहा हूँ कि क्यों खाया। पर्दों में 24 सलवटें हैं। जितनी ज्यादा सलवटें उतनी अमीरी। इतना खालीपन है कि सोच रहा हूँ अपनी कहानी दीवारों को सुना दूँ। फिर दीवारें रोती रहेंगी मैं सोता रहूंगा।

एक कमरा, एक पंखा, एक छत, एक ट्यूब लाइट, एक बेड, एक तकिया, एक गिलास, एक मैं।। किसी का इंतजार करता हुआ, किसी न हो सकने वाली चीज का इंतजार, आप किसी का इंतज़ार कीजिए , अनंत समय तक, वे भूल जाएँगे आना, फ़ोन करना या sms करना भी, आप उनसे बात कीजिये , वे फिर भी भूल जाएँगे, किसी रोज़ वे यह भी भूल जाएँगे कि आप उन्हें भूल गए हैं । कितना आसान है कितनी छोटी बात। मैसेज सीन करके छोड़ देना, हम्म पे बात खत्म कर देना, हर बात का जवाब ओके, वो भी 82 मिनट बाद, ये सब मना कर देना ही होता है। बिना पूछी बातों का भी जवाब मिल जाये ऐसी दुनिया मे जाना है।

आंखे खोल कर सोना सीख लिया है, आंसू को निकलने में आसानी होती है। रास्ता मिल जाता है।

सोसाइटी में इतने ऊंचे टावर बनाए इन्होंने। खुली बालकनी बनाई, शायद मेरे जैसे लोगों का काम आसान करने के लिए।  अकेला आदमी अगर 12th फ्लोर से  बालकॉनी में घूमें रात को । किसी को पता नही चलेगा, सब सोचेंगे शायद गमलों में पानी देते हुए पैर फिशल गया होगा। किसी चीज को शुरू करना मुश्किल होता है। खत्म करना आसान।

मैं आसान रास्ता चुन रहा हूँ।

आप सबको आपके नए वर्ष की शुभकामनाएं।

एनिमल 2023 रिव्यु

एनिमल, अपने नाम को सार्थक करती हुई फ़िल्म। 

सच में, हर इंसान जब पैदा होता है तो एक जानवर ही होता है। प्यार, माँ बाप, परिवार, समाज ओर शिक्षा उसे इंसान बनाती है। इनमे से कुछ  न मिले तो बुरा इंसान ओर कुछ भी न मिले तो वो जानवर बन जाता है। ये फ़िल्म यही सिखाती है।

बच्चे को इग्नोर करना इतना हिंशक होता है ये सिखाती है ये फ़िल्म। इस सच्चे जहर को पीना चाहते हो तो देखो। समय दो रिश्तों के बीच की चुप्पी को इतना खतरनाक बना देता है ये पचा सकते हो तो देखो।

अपने समय की फिल्मों से 10 कदम आगे, क्लासिक, बोल्ड, निडरता से कही गयी कहानी। बिना लाग लपेट के, बिना मुखोटा लगा, बिना किसी डर के प्लैन वनीला सिनेमा दिखानी की जिद। हैट्स ऑफ टू डायरेक्टर।

साइलेंट हिंसा क्या होती है ये इस मूवी से सीखो। जो हम सब करते है अपने बच्चों से, अपने माँ बाप से, अपने हर उस सख्श से जिसको हमसे कुछ उम्मीद है। ओर ये इग्नोरेंस आदमी को कैसा बना सकती है , सच मे हम सब ऐसे ही हैं कुछ कम कुछ ज्यादा। अनिल कपूर हैरान, क्रोधित होकर पत्नी पर चीखता है - "हमने एक क्रिमिनल पैदा किया है". लेकिन वो पैदा ऐसे नहीं हुआ होता है. वो बनाया है।

वो बच्चा डीसेंसेटाइज़ किया जाता है - माँ, पिता का इंतजार करते करते, उसके टाइम ओर प्यार को तरसते और कभी न पाते हुए, पैसा, अमीरी. पिता से पिटता है, जीजा जी से इनसल्ट, टीचर डंडे मारती है मामूली बात पर. रोंगटे खड़े करने वाला एक दृश्य है जहां टीनएजर बेटे रणविजय को बलबीर थप्पड़ें पर थप्पड़ें मारता है. 


स्ट्रांग ओपिनियन हर चीज को लेकर। ये जानवर हम ही बना रहे हैं, जाने अनजाने, ओर बाद में हम ही बोलते हैं कि बेकार है, illogical है, extream है। कभी सोचा है अकेलापन कितना एक्सट्रीम होता है,  अपनी बात न कह पाना कितना एक्सट्रीम होता है, चेहरे पे हंसी लाना जबकि अंदर दुखों का समंदर हो कितना illogical होता है। 

नही सोचा।

हिसाब बराबर

उसने रोटियां दी सेककर
नमकीन सपने दिए
बाजार दिए, दुपट्टे, बिंदी और बेमतलब की बातें दी
मैंने साढ़े तीन मिनट प्यार दिया

वो कहती की जब मेरे पास बैठती है
तो उसका मुँह कड़वा हो जाता है

मुझे बोरिंग आदमी बोलती थी
वही बोरिंग जिसकी छटी गर्लफ्रेंड ने
उससे "लगभग" शादी कर ली थी

जिओ ने सब कुछ फ्री कर दिया था
पर प्यार करने के पैसे देने पड़ते थे "एडवांस"
मुझे बड़ा आदमी बनना था
उसको माधुरी दीक्षित बनना था
उसकी शादी हुई तो सुकून मिला

उधार

१. रोज पीता हूँ बस जेब खाली होने तक
उधार की तो कभी टॉफियाँ भी नहीं खाई थी.

२. फेसबुक पोस्ट पे लाइक न आने के गम में भी पी लेता हूँ 
घाव की गहराई के अनुपात में ग़मजदा होना नहीं सीखा।

 

फेसबुक के ग्रुप फ़ोटो पर आये लाइक की कच्ची खुशी

अनाज कमाने घरों से भागे हम
अशर्फियाँ पाकर भी वापस क्यूँ नही लौट पा रहे
ये कहो ना प्यार है वाले टाइम कि बात थी
रहने वाले अपने मकान और न रहने वाले दूसरे के मकान के बीच
80 किलोमीटर लम्बी GT रोड
और चार पांच नजरें ना मिला सकने वाले मोड़
फ्रिज भी कब तक हमें बासी होने से बचाएगा
जी सिनेमा वहाँ भी आता है
और धूम 3 भी
इन कमरों में, जिनकी छतें भी रोने के आकर की बनायीं गयी हैं
एक बाल्टी पानी, 2 घंटे जिन्दा बचे रहने का हौसला देता है


यहाँ कुँआ होता तो तकलीफ़ थोड़ी कम होती
फेसबुक के ग्रुप फ़ोटो पर आये लाइक की कच्ची खुशी
या दिव्या भारती की सुपरहिट पिक्चर
फ़ैसला हमारे हाथों में हैं


एजाज़ पेंटर

अभी तुम इतने अच्छे दोस्त नहीं हुए
कि अँधेरे में तुम्हे फटा नोट ना पकड़ा सकूँ
बारिश भी हर बार हुई
और मैं हर बार हंसा गोविंदा वाली हंसी
फूट फूट कर
नंगे पैर, रेगिस्तान, ऊपर धुप
और क्या चाहिए जिन्दा रहने के लिए
शहर में शनिवार है
एजाज़ पेंटर से एक किलो "प्यार" ले आओ
कल दुकानें बंद रहेंगी
मैं शहद भरी कवितायेँ नहीं लिखता (अब)
अपना गुड साथ लेके आना

मौसम नौवीं क्लास की लड़की जैसा था


मैंने नदी का हाथ पकड़ के जिंदगी को देखा
तुमने रेलवे स्टेशन पे बैठकर
नशा आँखों में था या बातों में
ठीक से याद नहीं
अंधेरा तेरे गाल के कुए जितना था
(जहाँ मैंने कपडे धोए अक्सर और पलकों पे सुखाये)
और मौसम नौवीं क्लास की लड़की जैसा
आगे याद नहीं या मैं बताना नहीं चाहता

जिंदगी चावल का पानी है

तुमने जुखाम को इन्फ्लुएंजा कहना शुरू किया तो यकीन हुआ
की जिंदगी इतनी आसान नहीं है जितनी किताबों में लिखी थी।

ठंड इतनी थी की नदी भी पेड़ हो गयी थी
पर मै फिर भी बहा पत्तों की तरह

यह  उसी तरह था जैसे आखिरी महीने की तन्खवा छूट जाने का डर
नयी नोकरी की ख़ुशी में दब जाता है

302 केवल धारा नहीं होती
कभी घर आओ मेरे

तुम्हारी गर्दन पे क्या है दिखाना
कानों से सूंघते लोगो की कहानी सुनी है कभी

जिंदगी चावल का पानी है
पि लो या डूब जाओ

 

मेरे हिस्से की रौशनी

मैंने पानी बोया और आग काटी
और फिर हम नमकीन पर्वत पर चढ़े (वहां नदी भी थी घटनाओं की)
ताकि गलत और बहुत गलत में अंतर साफ़ दिखाई दे
और कुछ समय कागजों में बंद किया जा सके
जब सर से लोहा रिसा तो केवल मैंने देखा
ग से गमले थे जिनमे फूल बताये गये।
कई से पुछा मैंने वो रास्ता और सब ने गलत बताया


पीछे दलदल था, और कंकर
 आगे खुली हवा है और थोड़ी रौशनी(मेरे हिस्से की) ।

बर्गर, पिज्जा etc

तुमको बर्गर पसंद था और मुझे पिज्जा
लेकिन हमने नेहा फोटो स्टूडियो के सामने 12 वाला चावमीन खाया
और 3 वाली चाय, 21 रूपये मैंने दिए
बहुत गर्मी थी और मेरा फ़ोन चोरी हो गया था पर मै रोया नहीं
मंगलवार था और तेज हवा चल रही थी
एक और बात है जो मुझे जीने नहीं देती

पेट में सांप

बात काफी पुरानी है, १००० साल पुरानी मान सकते हो। एक राजा था उससे कम में काम नहीं चलेगा. उसको बेटे हुए, २ मान लो २ में काम चल जायेगा, दोनों बाग़ में खेलने जाते थे और भूख लगने पर आम तोड़कर खाते थे बचपन में।
और भी बहुत फल थे बाग़ में . उसी बाग़ में एक कोवा भी रहता था और वो भी कभी कभी आम खा लेता था
एक बार वो कोवा एक सांप के बिल से उसके अंडे खा आया और बाग़ में आकर मर गया, जहर से.
उसको राजा के बेटो ने खा लिया पका के. तो सांप के अंडे उनमे से एक लड़के के पेट में चले गये (इसी को बाद में बेड लक कहा गया होगा)
और पेट में ही सांप पैदा हो गया जिससे लड़का काफी कमजोर पड़ गया
तो राजा ने सोचा की इस लड़के की शादी कर देनी चहिये वर्ना टाइम का कुछ पता नहीं चलता
शादी हुई, राजा के लड़के की शादी थी सब आये। २ साल बाद लड़के की पत्‍नी पास के गाँव से घी तेल शेम्पू आदि सौदा लेने गई । सौदा लेकर पैसे देकर जब वह वापिस आ रही थी , तब उसने देखा कि उसका पति तालाब से कुछ दूरी पर एक साँप के बिल के पास सो रहा है । उसके मुख से साँप बाहर निकलकर हवा खा रहा था ।
एक दूसरा साँप भी अपने बिल से निकल कर फन फैलाये वहीं बैठा था । दोनों सांपो में बातचीत हो रही थी सुख दुःख की ।
वो उसका भाई था.